श्री मणिभद्र चालीसा (Shri Manibhadra Veer Chalisa)
श्री मणिभद्र वीर चालीसा
जन्म हुआ उज्जैन नगर में, मगरवाड़ा में स्वर्ग सिधारे।
तपागच्छ अधिष्ठायक देवा, श्रावकगण के ताज सितारे।।
मस्तक पूजा उज्जयिनी में, आगलोड़ में धड़ की पूजा।
मगरवाडे पिण्डी की पूजा, देखा ऐसा देव न दूजा।।
कलियुग में है जाग्रत स्वामी, संघ सकल के मंगलकारी।
रोग शोक हरते है सबके, जपते तुमको नित नर-नारी।।
श्यामवर्ण अजमुख मनोहारी, शीश मुकुट तेजस्वीधारी।
विघ्न-निवारक अन्तर्यामी, जिनवर के है आज्ञाकारी।।
त्रिभुवन में है तेज़ अनुपम, माणिभद्र है जन हितकारी।
महामुनि धरते ध्यान तुम्हारा, महिमा देखि जग में भारी।।
तुम देवों के देव निराले, वीर महाबली तारणहारे।
दुःख संकट हर्त्ता हो देवा, जन-जन तेरा नाम पुकारे।।
बावन वीर तुम्हारे वश में, चौसठ योगिनी नाम उच्चारे।
जो मणिभद्र जपे नित हरदम, उन सबको ये पार उतारे।।
समकितधारी विपत्ति विनाशक, सहाय करो हे अन्तर्यामी।
दुःख दारिद्र निवारो देवा, श्रावकगण के सच्चे स्वामी।।
जो कोई मन से ध्यान लगाते, उनके सब संकट मिट जाते।
रिद्धि सिद्धिदाता सुखदायी, सुमिरन करके सब सुख पाते।।
वन्ध्या को तुम सन्तति देते, निर्धन की झोली भर देते।
अंधों को तुम आँखे देकर, हरा भरा जीवन कर देते।।
कोढ़ी का हर रोग निवारण, कंचन सी काया कर देते।
भूखों को देते हो भोजन, दुखियों की पीड़ा हर लेते।।
भूत-प्रेत-भय शत्रु विनाशक, माणिभद्र हैं षटकर धारी।
तुम हो संघ सकल रखवारे, गुण गाती नित दुनिया सारी।।
आधि-व्याधि हर्त्ता, सुखकर्ता, डाकिनी शाकिनी कष्ट निवारो।
निर्बल को बल देते स्वामी, रक्षक बनकर पार उतारो।।
कृपा आपकी हो जाए तो, अकाल मृत्यु का त्रास ना होगा।
अकाल की छाया न पड़ेगी, महामारी उत्पात ना होगा।।
चोर लुटेरों का भय जग में, कभी नहीं संताप करेगा।
अग्नि का भय नहीं रहेगा, मणिभद्र सब विघ्न हरेगा।।
शक्तिशाली मणिभद्र हमारे, सकल संघ के काम सुधारो।
कृपा करो हे अंतर्यामी, भव सिंधु से पार उतारो।।
कार्य सिद्ध करते भक्तों के, मन वांछित फल सबको देते।
देव हो सच्चे प्रकट प्रभावी, आप शरण में सबको लेते।।
तन मन से जो सेवा करते, पाप-पुंज उन सबके हरते।
कृपापात्र बनकर महाबली के, निश्चित वे वैतरणी तैरते।।
सन्मति तुम देते जन-जन को, माणिभद्र दादा! उपकारी।
सिद्धिदाता, भाग्यविधाता, भविजन के सच्चे हितकारी।।
खडग-त्रिशूल सदा करधारी, मुदगर-अंकुश, नाग विराजे।
छुमक-छुमक पग झांझर बाजे, कर में तोरे डमरू बाजे।।
माणिभद्र की सेवा करके, सर्पदंश का भय नहीं रहता।
भक्त तुम्हारा नहीं कदापि, प्रकृति की बाधा सहता।।
माणिभद्र जपे जो कोई, घर-घर में मंगल है होई।
जिनका नहीं है अपना कोई, माणिभद्र सहायक होई।।
माणिभद्र की कृपा रहेगी, लक्ष्मी आ भण्डार भरेगी।
जीवन बगिया हरी रहेगी, ऋद्धि अपना काम करेगी।।
माणिभद्र महाबली देवा! संघ सकल मिल करता सेवा।
जो मरते थे भूख-प्यास से, वो पाते अब सुमधुर मेवा।।
व्यंतर देव उपद्रव करते, माणिभद्र बाधायें हरते।
शत्रु वहां आने से डरते, रक्षा वीर महाबली करते।।
माणिभद्र का सुमिरन करलो, आँखे मूँद तिजोरी भर लो।
पाप-पुंज सब अपने हर लो, शनैः शनैः भवसागर तर लो।।
ईति-भीति व्यापे नहीं कोई, माणिभद्र जो मन में होई।
संपत्ति जो होगी कही खोयी, आन मिलेगी सत्वर सोई।।
काम-कुम्भ और कल्पवृक्ष है, माणिभद्र का नाम निराला।
कामधेनु अरु चिंतामणि है, जीवन में कर देता उजाला।।
माणिभद्र का ध्यान लगाओ, सपने में नित दर्शन पाओ।
आग्लोड़ उज्जयनी जाओ, मगरवाड जा गुण-गुण गाओ।।
माणिभद्र जी कष्ट निवारे, उत्पातों से नित्य उबारे।
भक्तों के नित काम सँवारें, डूबती नैय्या पार उतारे।।
माणिभद्र की भक्ति से ही, मन की सब शंकाए मिटती।
उनकी नित पूजा करने से, विपत्तियां सारी ही कटती।।
माणिभद्र के सुमिरन से ही, मारग के कंटक हट जाते।
घुमड़-घुमड़ जो उमड़ चले हो, कष्टों के बादल छंट जाते।।
श्रद्धा जो रखते नर-नारी, जीवन में सुख वे पाते है।
संकट-मोचन मणिभद्र जी, घर में मंगल बरसाते है।।
हम भूले-भटके भक्तों को, माणिभद्र जी! राह बताओ।
हम तो है किंकर चरणों के, बाँह पकड़कर हमें उठाओं।।
तपागच्छ के अधिष्ठायक हो, मेहर करो हे समकितधारी।
हम चरणों की सेवा चाहे, दर्शन दो स्वामी अविकारी।।
माणिभद्र महाराज देवा, सकल संघ की रक्षा करना।
मन-मंदिर में बसकर देवा, नित भण्ड़ार सभी के भरना।।
रोज उतारे आरती देवा, प्रत्यक्ष दर्शन हमको देना।
मेवा मिठाईं, थाल चढ़ाये, चरणों में हमको ले लेना।।
माणिभद्र हम गिरे हुओं को, दुविधाओं से आज बचाओं।
आज शरण में ले लो हमको, वीर महाबली तत्पर आओ।।
जाग्रत-ज्योति, महाबली देवा, संघ चतुर्विध विनती करता।
आज अर्चना, पूजा करके, पाप-पुंज सब अपने हरता।।
कलश
हे महाबली! वीर देवा! शरण में अब लीजिये।
हम तुम्हारे चरण किंकर, देव रक्षा कीजिये।।
माणिभद्र चालीसा जो गाये, पूर्ण होगी कामना।
नैन नहीं होगा कदापि, उलझनों से सामना।।
Manibhadra Veer Chalisa in Hindi