श्री ज्ञान चालीसा (Gyan Chalisa)
श्री ज्ञान चालीसा
पानी पीवे छान कर, जीव जन्तु बच जाय।
जीव दया अति पुण्य हैं, रोग निकट नहि आय।।
झूठे पुरुषो से कभी, कोई न करता प्रीत।
सच्चे आदर पाते है, जग जस लेते जीत।।
चोर नित्य चोरी करे, रहे न कुछ भी पास।
वनों पहाड़ो भागते, दुःख पावे दिन रात।।
सेय पराई नार को, तन मन धन को खोत।
फिर भी सुख मिला नहीं, मेरे भयानक मौत।।
जोड़ जोड़ संचय करे, परिग्रह अपरम्पार।
कितने दिन है जीवना, क्यों नित ढोते भार।।
कुटुम्ब मोह का जाल है, कोई न जावे साथ।
भला बुरा जो कर गया, बनी रहेगी गाथ।।
बीड़ी मदिरा पीवना, नहीं भलो का काम।
भंग आदि की लत बुरी, क्यों होते बदनाम।।
रोगी तन को ठीक कर, ब्रह्मचर्य को पाल।
बिन पैसों की यह दवा, दूर भगावे काल।।
मरा कौन सब पूछते, पुंछ भुलाते बात।
चाल चूक शतरंज की, हो जाती है मात।।
सुख दुःख नित ही देखते, क्यों न लगावे ध्यान।
चिन्ता को अब छोड़कर, धारो सम्यक ज्ञान।।
कितने दिन का जीवना, कितने दिन की चाह।
ज्ञानी लेखा सोचले, मौलिक जीवन चाह।।
ऊपर से धर्मी बने, भीतर शुद्ध न एक।
रात दिवस ठगते फिरत, किस विधि रहती टेक।।
कारज को करते चलो, तन मन बस में राख।
होगी निश्चय ही विजय, आफत आये लाख।।
पाप अनेको ही किये, मुक्ति किस विधि होय।
छुटेंगे जंजाल सब, पाप मैल सब धोय।।
झूठे स्वार्थ को छोडकर, सत को उर में धार।
इस भव में शोभा बढे, आगे बेडा पार।।
पहले निज हो शुद्ध कर, पीछे पर उपदेश।
जो कहते करते नहीं, वे पाते हैं क्लेश।।
भीतर देह घिनावनी, हैं रोगों का धाम।
जब तक परदा ठीक है, करले अपना काम।।
देख बुदापे की दशा, थर थर कापे गात।
बड़े बुरे दिन बीतते, कोई न पूछे बात।।
पता किसी को न पड़े, कब आयेगा काल।
क्यों माया में उलझता, हैं मकड़ी का जाल।।
क्यों आया क्या कर गया, ज्ञानी पूछे बात।
लेखा कैसे देयगा, क्या तो जाता साथ।।
पापी तू तिर जाएगा, निश्चय ही यह मान।
पीछे की मत याद कर, आतम को पहचान।।
आये वो सब जायेंगे जग की यह हैं रीत।
थोड़े स्वार्थ कारने, क्यों नित गाये गीत।।
चाहे कितना हो भला, सुख दुःख का नहीं मेल।
कब के दुःख कब आपडे, देख जगत का खेल।।
रोग न छोड़े किसी को, पापी हो या सन्त।
इससे बचने के लिए, पकड़ो आत्म पन्थ।।
घूम रहा संसार में, कर कर उल्टी बात।
अभ भी चेतन सोचले, तज पुदगल का साथ।।
धर्मशाला दिन तीन की, नए मुसाफिर आत।
तू कब तक रह पायेगा, सोच ज्ञान की बात।।
नाम जगत में करन को, रूपये खर्चे लाख।
सच्ची सेवा के बिना, जम न सकेगी साख।।
मुर्ख ! जवानी जोर में, किये पाप बहुघोर।
अब भी चेतन चेतजा, विषय धर्म के चोर।।
बीती ताहि विसार दे, आगे की सुध लेय।
प्याला विष का छोड़कर, आत्म अमृत गेह।।
जीना मरना एकसा, मनुष्य जन्म को पाय।
आकर कुछ भी न किया, झूठा रुदन मचाय।।
गन्धक में पारा मिला, तपे पृथक हो जाय।
इसी तरह ही आत्मा, तन जड़ से हट जाय।।
क्रोध, कसाई हैं बुरा, समझो इसको आप।
मिनटों में झट मारता, गिने न माँ अरु बाप।।
शास्त्र अनेको ही सुने, दिया न असली ध्यान।
पोथी पढ़ पढ़ रह गये, उर में हुवा न ज्ञान।।
न्यारे न्यारे पन्थ हैं, जिनकी करते बात।
सत कोई नहि खोलता, मारग कैसे पात।।
अहंकार के कारने, लड़ते दिन अरु रात।
घर को नरक बना दिया, फिर भी छुटी न बात।।
लक्ष्मी चंचल है अति, सदा न रहती साथ।
दान न कोडी कर सका, जाता खाली हाथ।।
सेवा जननी जनक को, तीरथघर माही।
क्यों जग में खोजत फिरो, कल्प तरु की छाये।।
पुन्य चीज़ कुछ ओर हैं, धर्म चीज़ कुछ ओर।
पुन्य जगत का खेल हैं, धर्म मोक्ष की ठोर।।
होनी है सो होयेगी, मन में धीरज धार।
झूठा शगुन विचारता, क्या पावेगा पार।।
इससे बचने के लिए, छोड़ो पर की आस।
आत्म बल सबसे बड़ा, सदा तुम्हारे पास।।
Gyan Chalisa in Hindi